जमुई: बिहार के जमुई जिले में मनरेगा योजना के तहत बड़े पैमाने पर गड़बड़ी का मामला सामने आया है। ग्रामीणों को रोजगार और जल संरक्षण देने के उद्देश्य से चलाई जा रही इस योजना में कागजों पर तो विकास की तस्वीर दिखाई गई, लेकिन जब हकीकत जानने के लिए टीम धरातल पर पहुंची तो अधिकांश निर्माण कार्य गायब मिले। इस खुलासे के बाद पूरे इलाके में चर्चा तेज हो गई है।
मामला अलीगंज प्रखंड के एक पंचायत और उससे जुड़े मानपुर मौजा सहित आसपास के क्षेत्रों का बताया जा रहा है। आरोप है कि मनरेगा योजना के तहत यहां 37 तालाबों की खुदाई और 10 बांधों के निर्माण का भुगतान दिखा दिया गया, जबकि वास्तविकता में अधिकांश तालाब अस्तित्व में ही नहीं हैं और बांध तो एक भी नजर नहीं आया। सरकारी रिकॉर्ड में सभी कार्य पूर्ण दर्शाए गए हैं, लेकिन मौके की तस्वीर इससे बिल्कुल उलट है।
सूचना के अधिकार के तहत सामने आए दस्तावेजों के अनुसार जिन स्थानों पर तालाब और बांध बने होने की बात कही गई है, वहां दिनभर खोजबीन के बाद भी अधिकांश जगहों पर कुछ नहीं मिला। कुछ स्थानों पर जो तालाब मिले भी, वे अधूरे और मानक से काफी छोटे पाए गए। इससे साफ होता है कि योजना के नाम पर भारी अनियमितता की गई है।
शिकायत के बाद विभागीय टीम जांच के लिए मौके पर पहुंची, लेकिन जांच के दौरान भी स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। ग्रामीणों का आरोप है कि कागजों में दिखाए गए कई तालाब मौके पर मौजूद ही नहीं थे। बांध निर्माण की बात पूरी तरह झूठी साबित हुई। जब इस पर सवाल उठाए गए तो संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
ग्रामीणों में इस मामले को लेकर भारी नाराजगी है। लोगों का कहना है कि गरीबों को रोजगार देने और गांवों में जल संरचनाएं बनाने के नाम पर सरकारी धन की बंदरबांट की गई है। ग्रामीण इलाकों में जहां एक तालाब की सख्त जरूरत है, वहां कागजों में कई-कई तालाब दिखाकर राशि निकाल ली गई। इससे योजना की मंशा और सरकारी निगरानी व्यवस्था दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
विभागीय अधिकारियों की ओर से कहा गया है कि शिकायत के आधार पर जांच की जा रही है और सभी कार्यों का मिलान अभिलेखों से किया जाएगा। जांच पूरी होने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाएगा और रिपोर्ट उच्च स्तर पर भेजी जाएगी। वहीं तकनीकी पक्ष से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि कुछ जगहों पर काम हुआ है, हालांकि कमी की बात से भी इनकार नहीं किया गया है।
लगातार सामने आ रही विरोधाभासी बातों के बीच यह मामला और गंभीर होता जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो वे आगे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे। यह मामला केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इससे पूरे जिले में मनरेगा योजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं।
अब देखना यह है कि जांच के बाद सच्चाई सामने आती है या फिर यह मामला भी कागजों में ही दबकर रह जाता है। फिलहाल जमुई में मनरेगा के नाम पर हुए इस कथित घोटाले ने प्रशासन और व्यवस्था दोनों की परीक्षा ले ली है।